एंबुलेंस दीदी दुर्बा चटोपाध्याय को आज महिला कमिशन करेगी सम्मानित

सिलीगुड़ी, 8 मार्च (नि.सं.)। सिलीगुड़ी में बिना स्वार्थ दूसरों की सेवा करने वाली एंबुलेंस दीदी को कौन नहीं जानता है। एंबुलेंस दीदी दुर्बा चटोपाध्याय  महिलाओं के लिए एक उदाहरण है। वर्तमान में वह महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ ही यह दिखा रही है कि आज की महिला किसी भी मैदान में पीछे नहीं है। नारी अगर कुछ भी चाह ले तो वह पूरा कर सकती है।

एंबुलेंस दीदी दुर्बा चटोपाध्याय के समाज सेवा के प्रति सेवा को देखते हुए विश्व नारी दिवस के दिन यानी की आज राज्य महिला कमिशन कोलकाता में दुर्बा चटोपाध्याय को सम्मानित करेगी। विश्व नारी दिवस पर एंबुलेंस दीदी को महिला कमिशन से मिल रहे सम्मान से सिलीगुड़ी में भी खुशी का माहौल है।

इस मौके पर दुर्बा चट्टोपाध्याय ने कहा कि बचपन से ही जरूरतमंद लोगों की सेवा करने की इच्छा थी। वह किसी के बुरे वक्त में काम आ जाए। इसके लिए हर वक्त तैयार रहती थी। बचपन का वह सपना अब वह पूरा कर रही है। वह अपनी पेशा शिक्षिका के साथ ही समाजसेवा का काम भी कर रही है। कोरोना के समय में उन्हे पता चला कि बहुत से लोग ऐसे है,जो कि एंबुलेंस का खर्च भी नहीं दे सकते है। उस वक्त उन्होंने निशुल्क एंबुलेंस परिसेवा देने का निर्णय किया। उसके बाद पहले तो वह अपनी कार में मरीज को अस्पताल ले जाती थी। बाद में उन्होंने खुद एंबुलेंस चलाकर मरीजों को अस्पताल पहुंचाने का सिलसिला शुरू किया।

दुर्बा यह भी बताती है कि उन्होंने कभी भी समाजसेवा किसी नाम और सम्मान के लिए नहीं की है। वे तो अपने बचपन का सपना पूरा कर रही है। राज्य महिला कमीशन के तरफ से जो उन्हे सम्मान देने के लिए चुना गया है। वह उनके लिए बहुत बड़ी बात है। यह खबर सुनकर वह काफी खुश है।

उल्लेखनीय है कि पेशे से दुर्बा एक शिक्षिका है। लंबे समय से वह सिलीगुड़ी शहर के कई गैर सरकारी स्कूल में एक शिक्षिका के रूप में काम करते आ रही है। शिक्षिका पेशे के दौरान भी वह अपने छात्रों को शिक्षित करने के साथ ही समाज सेवा का काम चलाई जा रही है। परिवार में उनका दो बेटा और बुजुर्ग माता-पिता है। उनकी देखभाल भी खुद करती है। बड़ा बेटा पढ़ाई को लेकर बाहर रहता है। जबकि छोटा बेटा वकालत की पढ़ाई सिलीगुड़ी से कर रहा है। दुर्बा अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाने के साथ ही समाज के कई लोगो की भी जिम्मेदारी अपने कंधे पर उठाई है।

पिछले एक वर्ष से दुर्बा खुद एंबुलेंस चलाकर मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के साथ वापस घर भी लाने का काम कर रही है। बदले में किसी से कोई पैसे भी नहीं ले रही है। अगर कोई अपनी खुशी से गाड़ी में पेट्रोल भरवा तो वही बहुत है। पिछले वर्ष से लेकर अब तक दुर्बा ने करीब 75 मरीजों को अपने एंबुलेंस से अस्पताल पहुंचाई है।

दुर्बा को दिन हो या रात जब भी किसी मरीज का फोन आता है। वह अपनी एंबुलेंस लेकर पहुंच जाती है। जिसके बाद दुर्बा की इस परिसेवा को देख कर लोग उन्हें अब एंबुलेंस दीदी कहकर बुलाते है।

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