आनंदमयी कालीबाड़ी का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की यादों और प्रसिद्ध चारण कवि मुकुंद दास के योगदान से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि वर्ष 1924 में ब्रिटिश पुलिस की नजरों से बचकर बांग्लादेश के बरिशाल के चारण कवि मुकुंद दास सिलीगुड़ी पहुंचे थे। उस समय स्थानीय व्यापारियों की पहल पर बने छोटे और जर्जर मंदिर की स्थिति देखकर उन्हें दुख हुआ। इसके बाद उन्होंने स्वदेशी गीतों, नाटकों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से जुटाई गई राशि दान की और स्थानीय लोगों को प्रोत्साहित कर मंदिर को पक्का बनाने की पहल की।
बाद में वर्ष 1926 में मंदिर में कसौटी पत्थर से बनी मां काली की प्रतिमा स्थापित की गई और इसका नाम ‘आनंदमयी कालीबाड़ी’ रखा गया। वर्ष 1932 से यहां दुर्गापूजा की शुरुआत हुई। उस समय देश में ब्रिटिश शासन था और मंदिर परिसर पर पुलिस की निगरानी रहती थी। हालांकि, जनश्रुतियों के अनुसार, पूजा की आड़ में यहां क्रांतिकारियों की गुप्त बैठकें और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी गतिविधियां भी होती थी। इस कारण मंदिर धार्मिक आस्था का केंद्र होने के साथ-साथ स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों से जुड़ा एक ऐतिहासिक स्थल भी है।
आनंदमयी कालीबाड़ी की दुर्गापूजा का एक प्रमुख आकर्षण मां का भोग प्रसाद वितरण है। सिलीगुड़ी शहर के अलावा आसपास के ग्रामीण इलाकों में भी इस पूजा का विशेष महत्व है। माबुआ, नक्सलबाड़ी, खोरीबाड़ी, फांसीदेवा, घोषपुकुर, हांसिखावा, रामधनजोत और रवींद्रनगर सहित कम से कम 60 गांवों के लोग मां का भोग प्रसाद ग्रहण करने मंदिर पहुंचते हैं।
पूजा के दिनों में सुबह चार बजे से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ जुटने लगती है। दूर-दराज से आने वाले भक्त प्रसाद पाने के लिए लंबी कतारों में खड़े रहते हैं। चावल की खिचड़ी सहित विभिन्न प्रकार के भोग प्रसाद का वितरण हर वर्ष उत्सव के माहौल को और खास बना देता है। वर्षों पुरानी यह परंपरा आज भी कायम है और लोगों के बीच आपसी सद्भाव तथा एकता को मजबूत कर रही है।
धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ आनंदमयी कालीबाड़ी कमेटी सामाजिक दायित्वों के निर्वहन में भी सक्रिय है। चाय बागानों के जरूरतमंद श्रमिकों और बच्चों की मदद के लिए वस्त्र वितरण कार्यक्रम शुरू किया गया है। इसके तहत अब तक दो चाय बागानों के श्रमिकों और बच्चों को कपड़े वितरित किए जा चुके हैं। शताब्दी समारोह के हिस्से के रूप में आने वाले दिनों में इस अभियान को कुछ अन्य चाय बागानों तक भी विस्तारित करने की योजना है।
वर्तमान समय में जब दुर्गापूजा में थीम और भव्यता की प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है, तब आनंदमयी कालीबाड़ी अपनी पुरानी परंपरा, ऐतिहासिक विरासत और सामाजिक जिम्मेदारी को प्राथमिकता दे रही है। चारण कवि मुकुंद दास की स्मृतियों से जुड़ी इस मंदिर की 96वीं दुर्गापूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम की यादों, बंगाल की संस्कृति और मानव सेवा का अनूठा संगम है।





