लोककथाओं के अनुसार, पांच सौ साल से भी पहले विजयादशमी की रात कैलाश लौटते समय स्थानीय चरवाहों की पुकार सुनकर मां दुर्गा अपने परिवार के साथ तीस्ता तट पर ठहरी थी। उस समय पूरा इलाका घने जंगलों से घिरा था और दिन में भी तीस्ता के रेतीले तट पर बाघों की आवाजाही होती थी। मान्यता है कि एक स्थानीय किसान के घर रात बिताने के बाद देवी ने एकादशी की सुबह पूजा स्वीकार की थी। इस दौरान ग्रामीणों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार कबूतर, बकरे सहित विभिन्न वस्तुएं देवी को अर्पित की। पूजा के बाद रात में देवी कैलाश के लिए रवाना हो गई।मान्यता है कि उसी वर्ष से पूरे क्षेत्र में अनाज के भंडार समृद्ध होने लगे। तभी से मां दुर्गा यहां भंडानी देवी के रूप में पूजित हैं। पांच शताब्दियों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी स्थानीय लोगों के बीच यह धार्मिक विश्वास और परंपरा आज तक कायम है।
एकादशी की सुबह से ही भंडानी पूजा में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी। मनोकामना पूरी होने की आशा में कई भक्त देवी को कबूतर और बकरे अर्पित करते हैं। दिनभर पूजा-अर्चना के साथ इलाके में मेले का भी आयोजन किया गया, जिससे पूरे क्षेत्र में उत्सव का माहौल बना रहा।
पांच सौ साल से अधिक पुरानी यह पूजा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक ही नहीं, बल्कि बार्निश क्षेत्र की समृद्ध परंपरा और लोकसंस्कृति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। रात में घट विसर्जन के साथ मां भंडानी की पूजा संपन्न होती है।





